ब्राह्मणाच्या  गाई  राखणे








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          सर्वज्ञांचा  एका  गावात  मुक्काम  होता.  सर्वज्ञ  भिक्षेसाठी  एका  ब्राह्मणाच्या  घरी  गेले.  ब्राह्मणाने  म्हटले  अंगापिंडाने  मजबूत  चांगले  लांबरूद  धडधाकट  दिसता  गोरे  गोमटे  आहात  कामधंदा  करायचे  सोडून  खुशाल  भिक्षा  मागता  कोणाच्या  गाई  का  राखत  नाही,  सर्वज्ञ  म्हणाले,  आम्ही  गाई  राखण्यास  तयार  आहे.  परंतु  आमच्याकडून  कोणी  गाई  राखून  घेत  नाही.  ब्राह्मणाने  म्हटले  आम्ही  देतो  गाई  राखण्यास  आमच्या  गाई  राखा.  शिंदोरीला  दहीभात  देत  जाऊ.  संध्याकाळी  दूधभाताचे  जेवण  देऊ.  

        सर्वज्ञ  म्हणाले  आम्ही  गाई  राखू  पण  दोहणार  नाही  सोडू  पण  बांधणार  नाही.  त्याने  म्हटले  आम्हीच  बांधू  आणि  आम्हीच  दूध  काढू.  सर्वज्ञांनी  मान्य  केले.  ब्राह्मणाने  म्हटले  तरी  या  ओट्यावर  तुम्ही  रहा.  आमचा  गुराखी  गेला  आहे.  त्याच्या  जागेवर  तुम्ही  झोपा.  मग  त्या  गुराख्याचा  कांबळा  वाहाणा  काठी  उपरणे  असे  सर्वज्ञांना  दिले. 
         रात्री  सर्वज्ञांना  दूधाभाताचे  भोजन  दिले .  सर्वज्ञांनी  त्यांच्या  घराच्या  दरवाज्याच्या  बाहेर  ओट्यावर  नीद्रा  केली.  सकाळी  ब्राह्मण  सर्वज्ञांना  सांगू  लागला  गाई  कोणाच्या  शेतात  जाऊ  देवू  नका.  कोणाच्या  शेताच्या  बांधला  चारु  नका.  जेथे  चांगले  हिरवेगार  रान  असेल  तेथे  गाई  नेऊन  तेथे  चाराव्यात  दुपारच्या  वेळी  गाईना  पाणी  पाजावे.  दुपारी  चांगली  दाट  झाडाची  सावली  पाहून  तेथे  गाई  बसवाव्यात.  असे  सांगून  तो  थांबला.

         मग  सर्वज्ञ  गाई  रानात  घेऊन  गेले.  रानात  आल्यावर  सर्वज्ञ  एका  खडकावर  बसले.  सर्व  गाई  सर्वज्ञाभोवती  गोलाकार  बसून  सर्वज्ञांची  श्रीमुर्ती  न्याहाळीत  आनंदाने  रवंथ  करीत  बसल्या  होत्या.  डोळे  विस्फारुन  शेपूट  पसरवून  एकमेकांच्या  मानेवर  माना  घालून  श्रीमुर्ती  न्याहाळू  लागल्या.  मग  संध्याकाळच्या  वेळी  सर्वज्ञ  पुढे  गाई  मागे.  सर्वज्ञांनी  वाड्यात  गाई  घातल्या.  ब्राह्मणाने  गाई  बांधल्या  सर्वज्ञ  ओट्यावर  बसले.  

त्या  दिवशी  ब्राह्मणाने  गाईचे  दूध  काढले.  तर  रोजच्यापेक्षा  दुप्पट  दूध  निघाले  दही  लोणी  तूप  भरपूर  झाले.  मग  ते  आंथरुणात  गोष्टी  करु  लागले  आज  दूध  नेहमीपेक्षा  दुप्पट  निघाले.  दोघांनाही  आश्चर्य  वाटू  लागले.  काढता  हात  दुखून  जात  होते.  

        मग  ते  सर्वज्ञांना  दुधाभाताचे  भोजन  देत.  अशा  प्रकारे  सर्वज्ञ  दररोज  रानात  गाई  घेऊन  जात  होते.  आणि  गाई  सर्वज्ञांच्या  सभोवताली  बसून  आनंदाने  रवंथ  करीत  होत्या.  असे  तिन  दिवस  तो  ब्राह्मण  सर्वज्ञांना  काही  अंतरावर  पोहचवायला  यायचा.  पुन्हा  घरी  येतांना  त्यास  इतर  गुराखी  म्हणायचे  अहो  असा  कोणता  गुराखी  तुम्ही  गाई  राखायला  ठेवला  आहे  गाईंना  चारा  नाही  गवत  नाही  की  पाणी  नाही  सावली  नाही.  गाई  घेऊन  खडकावर  बसतो.  असे  दोन  दिवसापर्यंत  गुराख्यांनी  त्या  ब्राम्हणला  सांगितले. 

           मग  त्याने  मनात  विचार  केला  खरे  काय  आहे  दूध  तर  रोजच  जास्त  निघते.  आन  हे  गुराखी  असे  काय  सांगतात  हे  साधू  महात्मे  राहातील  तोपर्यंत  राहातील  केव्हा  जातील  काही  सांगता  येत  नाही.  तरी  हे  कोण्या  ठिकाणी  गाई  चारायला  नेतात  ते  आपण  पाहून  ठेऊ.  म्हणून  तो  तिसऱ्या  दिवशी  पहायला  गेला.


          एका  झाडावर  लपून  बसला.  तेव्हा  त्याला  गुराखी  जे  सांगत  होते  तेच  दिसले.  सर्वज्ञ  खडकावर  बसलेले  होते.  भोवती  गाई  आनंदाने  रवंथ  करीत  बसल्या  होत्या.  मग  तो  मनात  म्हणू  लागला  अरे  हे  कोणी  सामान्य  महात्मे  संन्यासी  नाहीत  हे  तर  साक्षात  (श्रीकृष्ण)  भगवान  आहेत.

         मग  तो  घरी  आला  पत्नीला  सांगू  लागला  अगं  आपल्या  गाई  कोण  राखतो  आहे  हे  तुला  माहिती  आहे  का  अंग  साक्षात  (श्रीकृष्ण) ते  आल्यावर  मग  तू  एका  पायावर  मस्तक  ठेव  मी  एका  पायावर  मस्तक  ठेवतो.  मग  त्यांना  विचारु  आपण  कोण  आहात..??

 सर्वज्ञांनी  संध्याकाळच्या  वेळी  गाई  रानातून  गावात  आणल्या.  वाड्यात  गाई  सोडून  देऊन  सर्वज्ञ  परस्पर  निघून  गेले.....🖊️🖊️*
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*🙏 दंडवत प्रणाम् 🙏*



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